जिसको आज मुझमे हजारो गलतिया नजर आती हैं कभी उसी ने कहा था तुम जैसे भी हो मेरे हो
कमाल की मोहब्बत थी मुझसे उसको अचानक ही शुरू हुई और बिना बताये ही ख़त्म हो गई
मैं बैठूंगी जरूर महफ़िल में मगर पियूँगी नहीं क्योंकि मेरा गम मिटा दे इतनी शराब की औकात नहीं
मेरी गलती बस यही थी के मैंने हर किसी को खुद से ज़्यादा जरुरी समझा
उस मोड़ से शुरू करनी है फिर से जिंदगी जहा सारा शहर अपना था और तुम अजनबी
अपनी तन्हाई में तनहा ही अच्छी हूँ मुझे ज़रूरत नहीं दो पल के सहारो की
जिंदगी से सिकवा नहीं की उसने गम का आदी बना दिया गिला तो उनसे है जिन्होंने रौशनी की उम्मीद दिखा के दीया ही बुझा दिया
